
आर्सेनिक फिल्टर आर्सेनिक को खत्म नहीं करते। वे उसे एक अवशिष्ट गाद (स्लज) में समेट देते हैं, जिसे भारतीय कानून खतरनाक कचरा मानता है। बिहार में उस गाद का आगे क्या होता है, यह किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज नहीं है।
What to know about भारत भूजल से आर्सेनिक निकाल रहा है। वह
आर्सेनिक मनुष्य के लिए बेहद जहरीला तत्व है। यह ह्रदय और रक्त वाहिनियां, रोग प्रतिरोधक क्षमता, लीवर, किडनी, मूत्राशय, त्वचा और नसों तक को नुकसान पहुंचाता है। फिर भी उद्योगों में इसका इस्तेमाल होता है, खासकर सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने में और लकड़ी को सड़ने से बचाने वाले रसायनों में।
पर बिहार के भूजल में जो आर्सेनिक है, उसका इन उद्योगों से कोई लेना-देना नहीं है।
हर साल देश भर में लगे आर्सेनिक फिल्टर पानी से भारी मात्रा में आर्सेनिक निकालते हैं। पर एक बात यहीं समझ लेनी चाहिए। आर्सेनिक हटाने वाली मशीन उसे तोड़ती नहीं है। जो पानी से निकलता है वह आर्सेनिक ही रहता है, बस अब वह फिल्टर माध्यम (मीडिया) से चिपका होता है। जब वह माध्यम भर जाता है या उसे धोकर दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाया जाता है, तो पीछे एक गाद बचती है जिसके हर घन मीटर में पांच से सात किलोग्राम आर्सेनिक होता है।
क्या भारतीय कानून इसे खतरनाक कचरा मानता है? जवाब उतना सीधा नहीं जितना लगता है।
खतरनाक एवं अन्य अपशिष्ट (प्रबंधन एवं सीमापार संचलन) नियम, 2016 की पहली अनुसूची में आर्सेनिक वाली गाद दर्ज तो है, पर सिर्फ तब जब वह लोहे के अलावा अन्य धातुओं को गलाने से निकली हो, या नाइट्रोजन वाले उर्वरक बनाने से। पीने के पानी पर होने वाली प्रक्रिया इस सूची में मौजूद ही नहीं है।
बचती है दूसरी अनुसूची, जिसमें आर्सेनिक के लिए पांच मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा तय है। पर यह माप गाद पर नहीं होती। यह उस पानी पर होती है जो प्रयोगशाला की एक तय जांच में नमूने से रिसकर बाहर आता है। कौन सी जांच, और किन हालात में हो रही है, इससे बहुत फर्क पड़ता है। आगे इसी पर लौटेंगे।
जमीन के नीचे की कहानी
बिहार के भूजल का आर्सेनिक किसी कारखाने से नहीं आया। वह हजारों साल में हिमालय से नदियों के साथ बहकर आया और गंगा के मैदान में जमा होता गया। वहां वह लोहे वाले खनिजों के भीतर बंद पड़ा रहता है, और उस हालत में किसी के लिए खतरा नहीं है।
वह तब छूटता है जब जमीन के नीचे पानी की परत का रासायनिक संतुलन बदलता है। गंगा के मैदानी इलाकों की नई मिट्टी में दबे सड़े-गले पदार्थ पर बैक्टीरिया पनपते हैं और पानी में घुली ऑक्सीजन खाते जाते हैं। ऑक्सीजन खत्म होते ही लोहे के खनिज घुलने लगते हैं, और उनके भीतर बंद आर्सेनिक छूटकर पानी में आ जाता है।
इसीलिए यह समस्या गंगा के किनारे की नई मिट्टी वाली पट्टी में है, और इसीलिए गहराई से इतना फर्क पड़ता है। पटना और भोजपुर पर किये गए 2010 के एक अध्ययन में ज्यादातर प्रदूषण करीब पचास मीटर से ऊपर मिला, और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के मुताबिक यह मुख्य रूप से सौ मीटर के भीतर है।
ऑक्सीजन का खत्म होना और लोहे का घुलना, यह क्रम याद रखना चाहिए। आगे यह एक अनपेक्षित जगह पर लौटेगा।
कितना बचा है, और कौन बता रहा है
सरकारी गिनती के हिसाब से समस्या लगभग सुलझ चुकी है। नवंबर 2016 में सरकार ने लोकसभा को बताया कि बिहार में 1,075 आर्सेनिक प्रभावित बस्तियां हैं। मार्च 2021 तक यह संख्या 385 रह गई, और जुलाई 2023 तक देश भर में बची 460 बस्तियां पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में थीं। बिहार इस सूची में नहीं था।
शोध से मिलने वाला चित्र अलग है। दिसंबर 2023 में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण को दीएक रिपोर्ट में कहा कि बिहार के 27 जिलों में भूजल में आर्सेनिक दस माइक्रोग्राम प्रति लीटर, भारत और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों की तय सीमा, से ऊपर मिला है। विकास कुमार और शशांक शेखर की 2025 की H2Open Journal में प्रकाशित एक समीक्षा, 22 जिलों और 87 प्रखंडों को प्रभावित क्षेत्र और एक करोड़ से ज्यादा लोगों को खतरे में बताती है।
इन आंकड़ों के साथ एक बात जोड़ देनी चाहिए। यह समीक्षा दो दशकों के प्रकाशित अध्ययनों को जोड़कर बनी है, जिनका दायरा और तरीका अलग-अलग है। इसमें कोई नई जांच नहीं की गई है। एक करोड़ का आंकड़ा कहीं इस्तेमाल करते समय यह ध्यान में रहे।
दोनों गिनतियां एक-दूसरे को गलत नहीं ठहरातीं, क्योंकि वे अलग-अलग चीजें गिन रही हैं। जल जीवन मिशन के दिशानिर्देशों के मुताबिक किसी बस्ती को गुणवत्ता प्रभावित तभी माना जाता है जब पीने के पानी का स्रोत मानक पर खरा न उतरे और बचे हुए साफ स्रोत हर व्यक्ति को रोज चालीस लीटर पानी न दे पाएं। दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए। और जैसे ही साफ पानी की व्यवस्था हो जाती है, बस्ती सूची से हट जाती है।
यानी जो गिना जा रहा है वह पानी पहुंचाने की व्यवस्था है, जमीन के नीचे का आर्सेनिक नहीं। वह इस पूरी प्रक्रिया से अछूता रहता है।
इसका मतलब यह नहीं कि काम नहीं हुआ। घरों को दूषित उथले पानी की जगह साफ की हुई नदी के पानी पर लाना सबसे टिकाऊ हल है, और बिहार ने गंगा के किनारे कई गांवों को जोड़ने वाली जलापूर्ति योजनाएं इसी मकसद से बनाई हैं। पर जहां-जहां हल स्रोत बदलने के बजाय पानी साफ करना है, वहां आर्सेनिक पानी से निकालकर कहीं और डाला जा रहा है।
मशीनें असल में क्यों नाकाम होती हैं
आमतौर पर कहा यह जाता है कि आर्सेनिक पानी में आर्सेनाइट यानी As(III) के रूप में आता है, जो पीने के पानी की पीएच पर बिजली के लिहाज से उदासीन रहता है, और इसलिए उन फिल्टर माध्यमों से बचकर निकल जाता है जो ऋण आवेश वाले कणों को खींचकर काम करते हैं।
यह बात एक्टिवेटेड एल्युमिना और आयन एक्सचेंज रेजिन के लिए सही है। लोहे वाले फिल्टरों के लिए नहीं। ताजा बना आयरन ऑक्साइड अपनी सतह पर सीधे रासायनिक बंध बनाकर आर्सेनिक को पकड़ता है, और करीब 7.5 पीएच पर वह As(III) को उसके ऑक्सीकृत रूप As(V) से ज्यादा मजबूती से बांधता है। पश्चिम बंगाल में नलकूप पर ही लगी इकाइयों में As(III) अक्सर As(V) से ज्यादा पूरी तरह हटा, और रास्ते में उसका बहुत कम ऑक्सीकरण हुआ।
Key context and latest developments
तो अड़चन रसायन नहीं थी। जो नाकामियां दर्ज हैं, वे कहीं ज्यादा मामूली हैं। 2017 में प्रकाशित एक आकलन में पश्चिम बंगाल के 570 आर्सेनिक संयंत्रों में से 475 बेकार पाए गए और 145 बिल्कुल बंद पड़े थे। केमिकल की मात्रा ठीक न डालना, भर चुके माध्यम को न बदलना और आखिर में संयंत्र को छोड़ देना, ये दिक्कतें बार-बार सामने आईं। 2008 तक सैकड़ों आयातित मशीनें, जो एक बार भरने के बाद दोबारा इस्तेमाल नहीं होतीं, क्षमता खत्म होते ही छोड़ दी गई थीं। बिहार की शुरुआती मशीनें, जो यूनिसेफ की मदद से लगी थीं, कुछ ही महीनों में छोड़ दी गईं क्योंकि गांव ने उन्हें अपना नहीं माना। यह बात पटना के पर्यावरण वैज्ञानिक अशोक घोष ने 2012 में डाउन टू अर्थ से कही थी।
ये प्रमाण ज्यादातर पुराने हैं, और अधिकतर बिहार के नहीं, पश्चिम बंगाल के हैं। बिहार में हाल में लगी मशीनों ने कैसा काम किया, इस पर प्रकाशित शोध चुप है। आगे बढ़ने से पहले यह कमी दर्ज कर लेनी चाहिए।
आर्सेनिक जाता कहां है
अब जमीन के नीचे वाला क्रम लौटता है।
आर्सेनिक आयरन ऑक्साइड से तब तक चिपका रहता है जब तक उसके चारों ओर ऑक्सीजन बनी रहे। उसी गाद को अगर ऑक्सीजन रहित जगह में डाल दिया जाये, चाहे वह कूड़े का ढेर हो, बिना अस्तर वाला गड्ढा हो या पानी भरी जमीन, तो फिर वही प्रक्रिया दोबारा शुरू हो जाती है जिसने भूजल को दूषित किया था। लोहा घुलता है, और साथ ही उस पर टिका As(V) घटकर As(III) बन जाता है, जो उन ऑक्साइडों से भी ठीक से नहीं चिपकता जो खुद उन हालात में टिके रहते हैं।
यह दूसरा रास्ता अहम है। इसका मतलब यह हुआ कि खतरा सिर्फ लोहे वाले फिल्टरों तक सीमित नहीं है।
लेहाई विश्वविद्यालय के अरुप सेनगुप्ता ने 2006 में इस ओर ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा था कि जो बाजार में मिलने वाले अधिशोषक (एड्सॉर्बेंट) मानक निक्षालन परीक्षण (लीचिंग टेस्ट) पास कर जाते हैं, वे भी दफनाए जाने के बाद आर्सेनिक छोड़ सकते हैं, क्योंकि इस जांच में असली कचरा-स्थल जैसी ऑक्सीजन-रहित हालत बनाई ही नहीं जाती। जिस जांच की वे बात कर रहे थे, भारतीय कानून उसी पर टिका है।
आंकड़े बताते हैं कि यह फासला कितना बड़ा हो सकता है। पश्चिम बंगाल की मशीनों की गाद में हर ग्राम सूखे ठोस में करीब 32 मिलीग्राम आर्सेनिक था, और उससे रिसने वाले पानी में, जितनी भी पीएच पर जांच हुई, हर बार 0.2 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम आर्सेनिक मिला। यानी पांच मिलीग्राम की सीमा से कहीं भीतर। यानी आर्सेनिक की गाद कानून की नजर में पूरी तरह सामान्य हो सकती है, और फिर भी ठीक वही चीज हो सकती है जिसकी चेतावनी सेनगुप्ता दे रहे थे।
उनके समूह ने इसका हल डिजाइन में ही निकाला। पश्चिम बंगाल की उन इकाइयों में फिल्टर धोने से निकला घोल जमाकर जानबूझकर खुली हवा वाले मोटे बालू के फिल्टर पर रखा जाता है, ताकि लोहा Fe(III) बना रहे और आर्सेनिक उससे बंधा रहे। दूसरे शोधकर्ताओं ने गाद कोसीमेंट या ईंट में बांध देने का सुझाव दिया है। दोनों तरीके काम करते हैं। दोनों के लिए पहली शर्त यह है कि किसी ने यह सवाल पूछा हो।
बिहार में यह सवाल सार्वजनिक रूप से पूछा गया हो, ऐसा दिखता नहीं। जो सामग्री उपलब्ध है, जिसमें राज्य के अधिकरण में दाखिल कागजात, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की छपी सामग्री और जल जीवन मिशन के दिशानिर्देश शामिल हैं, उसमें कहीं यह नहीं मिलता कि भर चुका फिल्टर माध्यम और गाद आखिर में कहां जाते हैं, उन्हें कौन संभालता है, या इसका कोई हिसाब रखा जाता है या नहीं।
इससे यह साबित नहीं होता कि आर्सेनिक वापस भूजल में रिस रहा है। इससे इतना जरूर निकलता है कि फिलहाल कोई यह कहने की हालत में नहीं है कि वह नहीं रिस रहा।
छोटे आंकड़े भी क्यों मायने रखते हैं
दस से पचास माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच की मात्रा को तकनीकी बारीकी मान लेने का मन करता है, क्योंकि भारत की पुरानी सीमा इसी दायरे के ऊपरी सिरे पर थी। प्रमाण इस बहस के दोनों पक्षों से ज्यादा सतर्क हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आर्सेनिक संबंधी दस्तावेज में पचास माइक्रोग्राम प्रति लीटर से नीचे भी फेफड़े और मूत्राशय के कैंसर तथा आर्सेनिक से जुड़े त्वचा रोगों का बढ़ा हुआ खतरा दर्ज है, और अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी अकार्बनिक आर्सेनिक को मनुष्यों के लिए कैंसर पैदा करने वाला मानती है। पर वही दस्तावेज यह भी दर्ज करता है कि कम मात्रा पर कितने आर्सेनिक से कितना नुकसान होता है इसे लेकर काफी अनिश्चितता है, और दस माइक्रोग्राम की सीमा को अस्थायी बताता है। वह सीमा इसलिए रखी गई है कि इलाज से इतना ही हासिल किया जा सकता है और प्रयोगशालाएं इतना ही माप सकती हैं, इसलिए नहीं कि यह सुरक्षित स्तर साबित हो चुका है।
बिहार में गंगा किनारे के जिलों के दो हजार कैंसर मरीजों पर हुए एक अध्ययन में उनके खून में आर्सेनिक की मात्रा पटना के अप्रभावित हिस्सों के स्वस्थ लोगों से काफी ज्यादा मिली। दो बातें यहां ध्यान देने की हैं। खून लंबे समय के संपर्क का कमजोर सूचक है, क्योंकि आर्सेनिक कुछ ही घंटों में खून से निकल जाता है। और अध्ययन यह साबित नहीं करता कि कैंसर आर्सेनिक से हुआ। वह एक दिशा की ओर इशारा करता है, किसी नतीजे तक नहीं पहुंचाता।
यह खाई कैसे पटेगी
दो बदलाव इस हालत को साफ-साफ दिखने लायक बना देंगे। दोनों के लिए किसी नए विज्ञान की जरूरत नहीं है।
पहला, जांच वहां होनी चाहिए जहां लोग सचमुच पानी पीते हैं, और बार-बार होनी चाहिए, सिर्फ स्रोत पर एक बार नहीं। किसी परिवार तक कितना आर्सेनिक पहुंच रहा है, यह इस पर निर्भर करता है कि वह कौन सा स्रोत इस्तेमाल करता है और उस स्रोत पर लगी मशीन अब भी चल रही है या नहीं। सूची से हटाई गई बस्ती और घड़े में साफ पानी वाला घर, ये दो अलग बातें हैं।
दूसरा, भर चुके फिल्टर माध्यम और गाद को ठिकाने लगाने का तरीका तय हो, लिखा जाए और उसकी जांच हो, और वह भी ऐसी हालत में जहां आर्सेनिक ऑक्सीजन के साथ बंधा रहे। इसके लिए खतरनाक कचरे के नियम दोबारा लिखने की जरूरत नहीं है। हां, यह मानना जरूर पड़ेगा कि खुली हवा में किए गए निक्षालन परीक्षण से यह पता नहीं चलता कि वही गाद ऑक्सीजन-रहित गड्ढे में क्या करेगी। यहां जांच का नतीजा जितना मायने रखता है, उससे ज्यादा यह मायने रखता है कि कचरा रखा कहां जा रहा है।
आर्सेनिक बिहार के भूजल में इसलिए पहुंचा कि जमीन के नीचे ऑक्सीजन खत्म हो गई और लोहे के खनिज घुल गए। यह दुर्भाग्य होगा अगर उसके इलाज का अंत वही हालत चापाकल के पीछे के एक गड्ढे में दोबारा बना देने में हो, और कोई इतने ध्यान से देख ही न रहा हो कि उसे पता चले।
यह लेख डॉ. समीर सौरव ने लिखा है, जो ए.एन.एस. कॉलेज, नबीनगर, औरंगाबाद, बिहार में रसायन विज्ञान के सहायक प्राध्यापक हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से रसायन विज्ञान में पीएचडी की है और हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों में विज्ञान पर लिखते हैं।
